अनियमित और अधिक घी, तेल, उष्ण मसालों, मिर्च और अम्ल रसो से बने खाद्य पदार्थों से यटका विकृति होती है. जो व्यक्ति अधिक शराब व सिगरेट पीते हैं उनके यकृत को अधिक हानि होती है. यकृत मे शोथ होने से पाचन क्रिया बिगड़ जाती है. रोगी शारीरिक रूप से निर्बल होने लगता है. यकृत भोजन को पचाने के लिए पित्त की उत्पत्ति करता है पित्त आंत्रों में पहुंचकर ” भोंज़न को पचाने में सहायता करता है. यकृत से निर्मित पित्त आवश्यकता के अनुसार आंत्रो मे जाता है. शेष पित्त पित्ताशय में एक्च होता रहता है. यकृत से पित्ताशय को जाने वाली पित्त वाहिनी में कोई गड़बड़ होने से पित्त रक्त में मिलने लगता है और पीलिया रोग की उत्पत्ति करता है.यकृत में शोथ होने पर यकृत पर्याप्त मात्रा में पित की उत्पत्ति नहीं कर पाता ऐसी स्थिति मेँ पाचन क्रिया विकृत होने से अनेक रोग विकारों की उत्पत्ति होती है. यकृत मे शोथ (सूजन) होने से यकृत कठोर और बड़ा हो जाता है. यकृत को हल्का-सा दबाने से दर्द होता है. जब यकृत की ऊपर की ओर वृद्धि होती है तो कंधे की अस्थि में दर्द होता है रोगी को खांसी होती है. यकृत विकृति होने पर पेट में दाईं और भारीपन अनुभव होता है रह-रहकर शूल की उत्पत्ति होती है. यकृत विकृति के साथ छाती मे जलन, उदर मे शूल, सिंरडेदर्द, बेचैनी और वमन की विकृति यानि उल्टी भी होती है.किशोर आयु के लडके व लडकियां भी यकृत विकृति के अधिक शिकार होते हैं, वे उत्तेजक (चाय, कॉफी) और चटपटे मिर्च मसालों तथा अम्ल रस से निर्मित घी, तेल से बने खाद्य पदार्थों का सेवन करने से यकृत विकृति के शिकार होते हैं. किशोर आयु के लडके-लडकियां बाजार मे दही-भल्ले, गोल-गणे, छोले-भटुहे आदि चटपटे स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ अधिक सेवन करते है. ऐसे किशोरों की पाचन क्रिया विकृत होने से यकृत वृद्धि होती है. यकृत वृद्धि यकृत मे शोथ के कारण होती है यकृत विकृति मे चेहरे पर ओर पलकों पर शोथ हो जाता है रोगी को भूख नहीं लगती शारीरिक निर्बलता तेजी से बढती है.

1. मूली का रस और मकोय का रस 20-20 ग्राम मिलाकर प्रात: और सायं सेवन करने से यकृत वृद्धि में बहुत लाभ होता है. 10-12 वर्ष के बच्चों को इस मिश्रण का आधी मात्रा में सेवन कराएं.

2. यकृत्त वृद्धि मे प्रतिदिन सुबह शाम गोमूत्र वस्त्र द्वारा छानकर 20 ग्राम पिलाने से बहुत लाभ होता है. (ताजे गोमूत्र का ही इस्तेमाल करना चाहिए.

3. यकृत वृद्धि मे वमन अधिक हो तो अर्क पुदीना, थोडा सा नीबू का रस मिलाकर. सेवन कराएं.

4. सोंठ, पीपल, चित्रक मूल, बायबिडंग, दंतीमूल सभी वस्तुएं 10-10 ग्राम लेकर कूट-पीसकर चूर्ण बनाएं इसमें 50 ग्राम हरड़ का चूर्ण मिलाकर रखे. प्रतिदिन 3 ग्राम चूर्ण सुबह, 3 ग्राम चूर्ण शाम क्रो हल्ले गर्म जल के साथ सेवन करने से यकृत वृद्धि मेँ बहुत लाभ होता है.

5. एक केले में कच्चे पपीते के दूध की सात आठ बूंदें मिलाकर, फेटकर भोजन फे बाद सुबह-शाम सेवन करने से यकृत वृद्धि नष्ट होती है.

6. अपराजिता के बीजो को भूनकर, कूट पीसकर बारीक चूर्ण बनाकर 3 ग्राम चूर्ण हल्ले गर्म जल से सुबह शाम सेवन करने से यकृत वृधि नष्ट होती है.

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7. जंगली गूलर की जड़ की छाल को 10 ग्राम मात्रा मे पीसकर, गोमूत्र मे मिलाकर, छानकर 25 ग्राम प्रतिदिन पिलाने से यकृत वृद्धि नष्ट होती है.

8. भांगरे के 10 ग्राम रस में अजवायन का 2 ग्राम चूर्ण मिलाकर सेवन करने से यकृत वृद्धि नष्ट होती है.

9. यकृत्त वृद्धि मे रोगी को वैगन का ’मुर्ता बनाकर खिलाने से बहुत लाभ होता है. इस भुर्ते को लोहे की कड़ाही मे सरसों के तेल के साथ बनाएं लाल मिर्च का इस्तेमाल करें.

10. मकोय का रस 25 ग्राम हल्का गर्म करके यकृत के ऊपर लेप करने से यकृत की वृद्धि नष्ट होती है. पुनर्नवा के रस का भी लेप कर सकते हैं.

11. जामुन के पत्तो का अर्क निकालकर 5 ग्राम की मात्रा में 4-5 दिन सेवन कराने से बहुत लाभ होता है.

12. हरी मकोय का अर्क 15 ग्राम, गुलाब के फूल 15 ग्राम और अमलतास का गूदा 15 ग्राम तीनों को पीसकर यकृत के ऊपर लेप करने पर यकृत वृद्धि नष्ट होती है.

13. छोटी मूली और कुचला दोनो 10-10 ग्राम लेकर, पीसकर यकृत पर ऊपर से लेप करने से यकृत वृद्धि नष्ट होती है.

14. सूखे आंवले का चूर्ण 4 ग्राम या आंवले का रस 25 ग्राम 150 ग्राम जल मे अच्छी तरह मिलाकर दिन में 4 बार सेवन करने से बहुत लाभ होता है.

15. बडी हरड़ को पीसकर चूर्ण बना ले पुराना गुड और हरड़ का चूर्ण मिलाकर. 1 ग्राम की गोलियां बनाकर छाया में सुखा लें 1-1 गोली सुबह-शाम ले 30-40 दिनों तक सेवन करने से बढे हुए यकृत के रोग मे बहुत लाभ होता है.

16. पपीते के बीजों को सुखाकर कपड़ छन चूर्ण बना लें 3 ग्राम चूर्ण लेकर इसमे आधा नीबू का रस मिला ले 1 दिन में 2 बार इस चूर्ण का सेवन करने से यकृत बुद्धि में बहुत लाभ होता है.

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